रविवार, 15 नवंबर 2009

GHAZAL


ग़ज़ल

पेड़ों से   अंकुर   फूटा तो    मैं       जनमा हूँ
मन का काला जल छूटा तो मैं जनमा हूँ

पत्थर चिनता रहा कहीं पर कभी कहीं पर
शिल्पकार ने छेनी पकड़ी मैं जनमा हूँ

जग का सारा दर्द मुझे   कुछ पता नहीं है
एक बिवाई को सहलाकर मैं जनमा हूँ

आकाशों से परे जहाँ कुछ गैबी-गैबी
चीर के धरती का सीना ही मैं जनमा हूँ

आज मेरी बेटी ने अपना ब्याह रचाया
उसके कल की आहट से ही मैं जनमा हूँ

कटा पेड़ या मरा कोई मैं मरा वहीं पर
कलकल हलचल सुनीं कहीं तो मैं जनमा हूँ

1 टिप्पणी:

  1. पहली बार आपकी रचना पढी बहुत गहराई से लिखते है आप......

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